वाराणसी, 23 मार्च। ज्योतिष्पीठ शंकराचार्य सचिवालय, श्रीविद्यामठ (केदारघाट) में सोमवार को आयोजित कार्यक्रम में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ‘1008’ ने ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी’ (शं.च.) के गठन की घोषणा की। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में गौमाता, ब्राह्मणों सहित सनातन धर्म के प्रतीकों और समाज के कमजोर वर्गों पर बढ़ते अत्याचारों को देखते हुए केवल शास्त्र-चर्चा पर्याप्त नहीं है, बल्कि संगठित संरचना की आवश्यकता है।
शंकराचार्य ने भगवान परशुराम के संकल्प का उल्लेख करते हुए कहा कि यह चतुरंगिणी सनातनी समाज के लिए ‘अभिभावक’ की भूमिका निभाएगी और समाज में व्याप्त भय को समाप्त करने का कार्य करेगी, ताकि लोग निर्भय होकर अन्याय के खिलाफ आवाज उठा सकें।
उन्होंने बताया कि संगठन का ढांचा प्राचीन भारतीय सैन्य परंपरा पर आधारित होगा, जिसमें 9 स्तरीय पदानुक्रम रहेगा। इनमें पत्तिपाल से लेकर महासेनापति तक विभिन्न पद निर्धारित किए गए हैं। शीर्ष स्तर पर एक परमाध्यक्ष तथा उनके अधीन पुरुष, महिला और तृतीय लिंग के प्रतिनिधियों के रूप में सर्वाध्यक्ष नियुक्त किए जाएंगे।

चतुरंगिणी को चार प्रमुख अंगों— मनबल, तनबल, जनबल और धनबल— में विभाजित किया गया है। मनबल में संत, विद्वान, पुरोहित, वकील और मीडिया से जुड़े लोग बौद्धिक नेतृत्व देंगे, जबकि तनबल के तहत शारीरिक रूप से प्रशिक्षित सदस्य सुरक्षा दायित्व निभाएंगे। जनबल में विभिन्न श्रेणियों के स्वयंसेवक शामिल होंगे और धनबल संगठन को संसाधन उपलब्ध कराएगा।
संगठन की सबसे छोटी इकाई ‘पत्ति’ होगी, जिसमें 10 सदस्य शामिल होंगे और इसका नेतृत्व पत्तिपाल करेगा। शंकराचार्य ने विश्वास जताया कि यह संगठन सनातन धर्म की रक्षा और आत्मसम्मान के लिए एक मजबूत आधार बनेगा।
इस अवसर पर मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय ने बताया कि ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी’ के लिए पंजीकरण प्रक्रिया आज से प्रारंभ कर दी गई है।









