लखनऊ/वाराणसी। प्रदेश की माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। परिषद के इस आदेश के तहत अब कक्षा 9वीं से 12वीं तक प्रदेश के सभी मान्यता प्राप्त विद्यालयों में केवल परिषद द्वारा अधिकृत (सरकारी) पुस्तकों से ही अध्ययन-अध्यापन कराया जाएगा।
यह निर्णय न केवल शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही निजी स्कूलों की मनमानी और अभिभावकों पर बढ़ते आर्थिक बोझ को कम करने की दिशा में भी निर्णायक साबित होगा।
परिषद के संज्ञान में यह बात लगातार आ रही थी कि अनेक निजी विद्यालय छात्रों को महंगी निजी प्रकाशकों की पुस्तकें खरीदने के लिए बाध्य करते हैं। इन पुस्तकों के चयन में गुणवत्ता से अधिक कमीशन को प्राथमिकता दी जाती थी, जिससे अभिभावकों को अनावश्यक आर्थिक दबाव झेलना पड़ता था।

नए आदेश के लागू होने के बाद अब विद्यालयों द्वारा किसी भी प्रकार की गैर-अधिकृत पुस्तक को अनिवार्य करना पूरी तरह प्रतिबंधित होगा। इससे शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता आएगी और अभिभावकों को राहत मिलेगी।
परिषद का मानना है कि एक समान और अधिकृत पाठ्य सामग्री से अध्ययन कराने से प्रदेश भर के छात्रों के बीच शैक्षिक स्तर में संतुलन स्थापित होगा। इससे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भी छात्रों को समान अवसर प्राप्त होंगे।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच शैक्षिक असमानता को कम करने में भी सहायक सिद्ध होगा।
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि यदि कोई विद्यालय इस निर्देश का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो उसके विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसमें विद्यालय की मान्यता पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
परिषद ने सभी जिला विद्यालय निरीक्षकों (डीआईओएस) को इस आदेश के कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए हैं
इस निर्णय के बाद अभिभावकों में संतोष का माहौल देखा जा रहा है। लंबे समय से महंगी किताबों की अनिवार्यता से परेशान अभिभावकों ने इसे राहत भरा कदम बताया है। वहीं शिक्षा जगत में भी इस निर्णय को एक सकारात्मक और दूरगामी प्रभाव वाला सुधार माना जा रहा है।
प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद का यह निर्णय शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, सुलभ और समान बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं, जिससे न केवल छात्रों का शैक्षिक स्तर सुधरेगा, बल्कि अभिभावकों का विश्वास भी मजबूत होगा।









