वाराणसी। भगवान महावीर जयंती के पावन अवसर पर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के श्रवण विद्या संकाय द्वारा “विश्व शांति में भगवान महावीर की शिक्षाओं की प्रासंगिकता” विषय पर एक वृहद राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन विश्वविद्यालय परिसर स्थित योग साधना केंद्र में गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में शिक्षाविदों, दार्शनिकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं मीडिया प्रतिनिधियों की सक्रिय सहभागिता रही।
कार्यक्रम का शुभारम्भ मंगलाचरण, मां सरस्वती एवं भगवान महावीर के चित्र पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो. रमेश प्रसाद ने भगवान महावीर के जीवन-दर्शन की वर्तमान वैश्विक संदर्भों में प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि भगवान महावीर का दर्शन केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए एक समग्र जीवन पद्धति प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि आज के हिंसा, भौतिकता और असहिष्णुता से ग्रस्त विश्व में ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने अनेकांतवाद को वैचारिक विविधता में एकता स्थापित करने का माध्यम बताते हुए इसे लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला बताया तथा विश्वविद्यालय को केन्द्रीय दर्जा दिए जाने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

मुख्य अतिथि श्री रमेश जी (प्रान्त प्रचारक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, काशी प्रान्त) ने कहा कि भगवान महावीर का जीवन आत्मसंयम, त्याग और अनुशासन का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने ‘जियो और जीने दो’ को विश्व शांति का मूलमंत्र बताते हुए कहा कि यदि समाज इस विचार को अपनाए, तो अधिकांश संघर्ष स्वतः समाप्त हो सकते हैं।
मुख्य वक्ता प्रो. प्रद्युम्न शाह सिंह (विभागाध्यक्ष, जैन-बौद्ध दर्शन विभाग, बीएचयू) ने जैन दर्शन के पंचमहाव्रत—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह—को मानव जीवन के नैतिक एवं संतुलित विकास का आधार बताया। उन्होंने अनेकांतवाद की व्याख्या करते हुए कहा कि सत्य बहुआयामी होता है और प्रत्येक दृष्टिकोण का अपना महत्व है, जो आज के ध्रुवीकृत समाज में सहिष्णुता एवं संवाद को सुदृढ़ करता है।
विशिष्ट अतिथि श्री देवदत्त पाण्डेय (सम्पर्क प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, काशी प्रान्त) ने युवाओं से महावीर के आदर्शों को अपनाकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. लेखमणि ने सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। राष्ट्रगीत के साथ संगोष्ठी का समापन हुआ।
इस अवसर पर प्रो. जितेन्द्र कुमार, प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल, प्रो. विधु द्विवेदी, प्रो. शैलेश कुमार मिश्र, प्रो. दिनेश कुमार गर्ग, डॉ. सत्येन्द्र कुमार यादव, डॉ. मधुसूदन मिश्र, डॉ. रानी द्विवेदी सहित अनेक विद्वान उपस्थित रहे।









