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भोग और बंधुओं में आसक्ति ही बंधन का कारण: जगद्गुरु नारायणानंद तीर्थ

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वाराणसी। अस्सी क्षेत्र स्थित श्री काशीधर्मपीठ, रामेश्वर मठ प्रांगण में आयोजित श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ सप्ताह के तीसरे दिन अनंतश्री विभूषित जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ महाराज ने श्रद्धालुओं को गहन आध्यात्मिक उपदेश प्रदान किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में बंधन का मूल कारण भोग-विलास और बंधु-बांधवों के प्रति अत्यधिक आसक्ति है, जबकि ईश्वर में स्थित मन ही मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

उन्होंने कथा प्रसंग में बताया कि ब्रह्मा जी के पुत्र कर्दम ऋषि ने कठोर तपस्या के माध्यम से भगवान को कपिल रूप में प्राप्त किया। माता देवहूति, जो मनु-सतरूपा की पुत्री थीं, उनके साथ तप, संयम और ब्रह्मचर्य के प्रभाव से भगवान स्वयं पुत्र रूप में अवतरित हुए। उन्होंने कहा कि जहां संयम, त्याग, ब्रह्मचर्य और ईश्वर उपासना का वातावरण होता है, वहीं भगवान का प्राकट्य संभव होता है।

जगद्गुरु ने आगे कहा कि भगवान कपिल ने माता देवहूति को उपदेश देते हुए स्पष्ट किया कि धन, भोग और संबंधों में आसक्त मनुष्य जन्म-मरण के बंधन में बंधा रहता है। इसके विपरीत, जो मनुष्य अपने मन को ईश्वर में स्थिर करता है, वह मोक्ष की प्राप्ति करता है। उन्होंने बताया कि सनातन धर्म की परंपरा में त्याग, साधना और ईश्वर की अनुभूति को ही जीवन का परम लक्ष्य माना गया है।

सांख्य दर्शन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक फल तभी प्राप्त होता है, जब वह ईश्वर के आश्रय में किया जाए। केवल कर्मकांड से नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और आत्मचिंतन से ही आध्यात्मिक उन्नति संभव है।

इस अवसर पर मुख्य यजमान देवमणि शुक्ला (मिर्जापुर) सहित काशीधर्मपीठ के निजी सचिव आनंद स्वरूप ब्रह्मचारी महाराज, एडवोकेट विनय तिवारी, मनोज मिश्रा, पंकज शास्त्री एवं सैकड़ों श्रद्धालु भक्तगण उपस्थित रहे।

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